भरगे सबके गाँव, मोर हे गावे सुक्खा।
रोवत खेती खार, हमन ला राखे भूखा।।
भेजत हव सन्देस, गाँव आ बरखा रानी।
तरसत हावे जीव, गिरादे अब तो पानी।।
जनम जनम के बंधना, मया प्रीत के छाँव। भुइँया के बेटा हरव, जेकर महिमा गाव।। मोर छत्तीसगढ़ी रचना कोठी।
तुरते ताही
गिधवा मोरो गाँव
गिधवा मोरो गाँव।। करिया माटी के चिन्हारी, बर पीपर के छाँव। धरती महतारी के अँचरा, गिधवा मोरो गाँव।। महमाया दाई के किरपा, अन्न...
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बाबा घासीदास गा, तोर आय हव द्वार। तँय हर दीया ज्ञान के, मोरो मन मा बार।। निचट अज्ञानी मँय हवव, बता ज्ञान के सार। बाबा अड़हा जान हव, जग ले मोल...
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निकले वापस फेर ना, आवय तोर जुबान। जइसे निकले तीर ले, आवय नहीं कमान।। आवय नहीं कमान, बात ला छेड़व गुनके। शारद दे आशीष, शब्द ला रखलव चु...
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ढोलक तबला थाप मा, बाजय मांदर संग। नाचय साधक साधके, देखव पन्थी रंग।। बाबा घासी दास के, करथे सुघ्घर गान। गावय महिमा देखले, गुरु के करत बखान।। ...
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