सुक्खा खेती खार, झने कर आना कानी।
रोवत आज किसान, देख ले बरखा रानी।
सुनले आज पुकार, गिरादे अब तो पानी।
नइहे जग मा जान, बिना पानी जिनगानी।
-हेमलाल साहू
जनम जनम के बंधना, मया प्रीत के छाँव। भुइँया के बेटा हरव, जेकर महिमा गाव।। मोर छत्तीसगढ़ी रचना कोठी।
सुक्खा खेती खार, झने कर आना कानी।
रोवत आज किसान, देख ले बरखा रानी।
सुनले आज पुकार, गिरादे अब तो पानी।
नइहे जग मा जान, बिना पानी जिनगानी।
-हेमलाल साहू
धरके माटी भेस 🌿 चिमनी के बाती कस जरके, अँधियार ला हरावँ। दया-मया के आखर भर के, सबके बात सुनावँ।। छत्तीसगढ़ी के माटी मा, अपन पसीन...