गिधवा मोरो गाँव।।
करिया माटी के चिन्हारी, बर पीपर के छाँव।
धरती महतारी के अँचरा, गिधवा मोरो गाँव।।
महमाया दाई के किरपा, अन्न-धान्य भंडार।
नीम छाँव मा बइठे हावय, बड़का तरिया पार।।
तरिया नरवा निरमल पानी, झलमल बहिथे धार।
कलकल करथे बगरत पानी, सींचय खेत खार।।
रुख राई ले धरती दाई, अपन करय सिंगार।
हाँसत हवे फूल फुलवारी, महकय नवा बहार।।
छोट बड़े सब चिरई चुरगुन, गिधवा मा सकलाय।
गुरतुर गुरतुर गीत सुनाके, सबके मन हरसाय।।
हावय तरिया अउ बाँधा मा, चिरई मन के ठाँव।
बाम्हन चिरई अगास उड़थे, बनकुकरा दे बाँव।।
नीलकंठ मारे झपटा ला, चमके नील परेव।
रंग बिरंगी आनी - बानी, चिरई मन के नेव।।
देशी संग बिदेशी चिरई, किसम किसम के आँव।
जेकर किस्सा कहनी बगरे, दुरिहा दुरिहा गाँव।।
हरियर चुनरी ओढ़य सुग्घर, लहलय खेती खार।
छावय घर घर मा खुशिहाली, बसे सुखी संसार।।
रंग रंग के भाजी पाला, उगथे बखरी बाग।
चेच अमारी पटवा खेड़ा, खावय भाजी साग।।
बहा पसीना खेत खार मा, करथे हरियर बाग।
बाँधे पगड़ी करय किसानी, सबके जागे भाग।।
दाई काकी भौजी बहनी, करथे मया दुलार।
बबा कका अउ भैया बाबू, हिम्मत दैय अपार।।
दू पैसा के खातिर जावय, सबो शहर के ओर
लहुटय घर तिहार के बेरा, बाँध मया के डोर।।
सुम्मत के रस्ता ला चुनके, चलथें सब परिवार।
समरसता के दीया जलथे, जगमग हो घर बार।।
सुवा ददरिया राग भरथरी, गावे एक्के संग।
राउत पंथी करमा नाचय, दिखथे एक्के रंग।।
माटी के ये दया मया ले, गढ़े गाँव के ठाँव।
मन के मंदिर मा बसथे, गिधवा मोरो गाँव।।
गाँव मोर हे गिधवा सुघ्घर, सरग इही बन जाय।
बोली बोलय छत्तीसगढ़ी, सबके मन ला भाय।।
रचनाकार- हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला बेमेतरा



