हेम के सार छंद
मया के राखी
भाई अउ बहनी के अटूट,
नेह-मया बगरावय।
सजे दुकनिया सबो बाट मा,
राखी सबों मनावय।।
मोर गोड़ हा खजुवावत हे,
समझे संगी भोला।
बहिनी मोर सुरता करत हे,
एही लगथे मोला।।
बार-बार आके कँउवा मन,
सगा संदेश लावय।
हरियर सावन देखत-देखत,
बहिनी सुरता आवय।।
राखी धरे निहारत बहिनी,
भाई अपन अगोरय।
बार-बार रस्ता ला देखत,
भाई राखी जोहय।।
गावत रहिथे चिरई-चिरगुन,
गुरतुर बोली बोले।
बहिनी तोर बाट ले आवत,
रखले दुआर खोले।।
बारह महिना रद्दा जोहत,
पथरागे हे आँखी।
बहिनी पहुँचिस तोर दुआरी,
बाँध मया के राखी।।
रचनाकार-हेमलाल साहू
गाँव-गिधवा, जिला बेमेतरा
जनम जनम के बंधना, मया प्रीत के छाँव। भुइँया के बेटा हरव, जेकर महिमा गाव।। मोर छत्तीसगढ़ी रचना कोठी।
28 अग॰ 2015
राखी के मया ( हेम के सार छंद)
मया करइया (हेम के सार छंद)
मया करइया (हेम के सार छंद)
मोर एक झन मया करइया,
लेवय सुध अधिरतिया।
आवव सुनलव ओकर कहनी,
नाव हवे फुलमतिया।।
नान-नान चुन्दी हे कहिके,
मोला देख लजाथे।
मीठ-मीठ ओ बात बना के,
मोला रोज फसाथे।।
दिखथव सुघ्घर कहिके ओहर,
अब्बड़ जी इतराथे।
गाँव-गली के जवान मन ला,
हँस-हँस खूब रिझाथे।।
नवा-नवा ले सिंगार करय,
सुरता मोर जगाथे।
अपन सहेली कन जाके ओ,
रंग-रंग बतियाथे।।
काला कइसे बताव संगी,
चढ़गे मया खुमारी।
रोज बहाना खोजत रहिथे,
मया बनिस बीमारी।।
पड़गे हव टूरी के चक्कर,
कइसे मोला फाँसिस।
गली-गली मा देख-देख के,
लोगन मोला हाँसिस।।
ओकर बनगे हव दीवाना,
बनके मँय मस्ताना।
टूरी हाँसत मोला कहिथे,
कविता तोर सुनाना।।
रचनाकार - हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा
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