मोर मया के किस्सा (हेम के सार छंद)
एक्के झन हे मोर मयारू, सुरता आवय रतिया।
सुनलव मोर मया के किस्सा, नाव हवे फुलमतिया।।
नान-नान चुन्दी कहिके, मोला देख लजाथे।
गुरतुर-गुरतुर गोठ सुनाके, हौले पास बुलाथे।।
सुघ्घर मुखड़ा अपन देख के, अब्बड़ ओ इतराथे।
गाँव-गली के टूरा जम्मो, मुस्की मा भरमाथें।।
घूमत-घूमत संग हाट मा, कहिथे– चूड़ी भाथे।
सुनतें ही दाम दुकनिया के, जिवरा मोर कपाथे।।
का ला कइसे बताव संगी, चढ़गे मया खुमारी।
ओकर संगे घूम-घूम के, छुटगे खेती-बारी।।
नवा-नवा ले सिंगार करय, सुरता मोर जगाथे।
ओकर एक्के मुस्की देखत, मन मोरो हरसाथे।।
रोज नवा फरमाइस करथे, हँसके बात बनाथे।
नखरा ओकर देखत-देखत, जेब मोर खुल जाथे।।
पड़गे हव टूरी के चक्कर, कइसे मोला फाँसिस।
देखत-देखत गिरेंव भरसा, लोग-बाग मन हाँसिस।।
मोरो कविता सुनके ओहर, हौले-हौले मुस्काथे।
गलत लिखें मा अँगरी धरके, मोला सही बताथे।।
दुख-सुख मा बनके सँगवारी, हिम्मत मोर बढ़ाथे।
अँधियारी जिनगी के रद्दा, दीया बन उजियाथे।।
कहिथे– "खर्चा कम करबे जी", मोला रोज सिखाथे।
बजार पहुँचत पाँच मिनट मा, दू झोला भर आथे।।
ओकर बनके मँय दीवाना, होगे हव मस्ताना।
टूरी कहिस– छोड़ कविता ला, कमई अपन दिखाना।।
मँय कहेंव– मेहनत घलो करहूँ, कविता नइ बिसराहूँ।
मया संग जिनगी गढ़के, दुनिया ला हँसवाहूँ।।
रचनाकार -हेमलाल साहू
गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा
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