15 जून 2026

‎गिधवा मोरो गाँव





‎गिधवा मोरो गाँव।।


‎करिया माटी के चिन्हारी, बर पीपर के छाँव।

‎धरती महतारी के अँचरा, गिधवा मोरो गाँव।।

‎महमाया दाई के किरपा, अन्न-धान्य भंडार।
‎नीम छाँव मा बइठे हावय, बड़का तरिया पार।।

‎तरिया नरवा निरमल पानी, झलमल बहिथे धार।
‎कलकल करथे बगरत पानी, सींचय खेत खार।।

‎रुख राई ले धरती दाई, अपन करय सिंगार।
‎हाँसत हवे फूल फुलवारी, महकय नवा बहार।।

‎छोट बड़े सब चिरई चुरगुन, गिधवा मा सकलाय।
‎गुरतुर गुरतुर गीत सुनाके, सबके मन हरसाय।।

‎हावय तरिया अउ बाँधा मा, चिरई मन के ठाँव। 
‎बाम्हन चिरई अगास उड़थे, बनकुकरा दे बाँव।।

‎नीलकंठ मारे झपटा ला, चमके नील परेव। 
‎रंग बिरंगी आनी - बानी, चिरई मन के नेव।।

‎देशी संग बिदेशी चिरई, किसम किसम के आँव।
‎जेकर किस्सा कहनी बगरे, दुरिहा दुरिहा गाँव।।

‎हरियर चुनरी ओढ़य सुग्घर, लहलय खेती खार।
‎छावय घर घर मा खुशिहाली, बसे सुखी संसार।।

‎रंग रंग के भाजी पाला, उगथे बखरी बाग।
‎चेच अमारी पटवा खेड़ा, खावय भाजी साग।।

‎बहा पसीना खेत खार मा, करथे हरियर बाग।
‎बाँधे पगड़ी करय किसानी, सबके जागे भाग।।

‎दाई काकी भौजी बहनी, करथे मया दुलार।
‎बबा कका अउ भैया बाबू, हिम्मत दैय अपार।।

‎दू पैसा के खातिर जावय, सबो शहर के ओर
‎लहुटय घर तिहार के बेरा, बाँध मया के डोर।।

‎सुम्मत के रस्ता ला चुनके, चलथें सब परिवार।
‎समरसता के दीया जलथे, जगमग हो घर बार।।

‎सुवा ददरिया राग भरथरी, गावे एक्के संग। 
‎राउत पंथी करमा नाचय, दिखथे एक्के रंग।।

‎माटी के ये दया मया ले, गढ़े गाँव के ठाँव।
‎मन के मंदिर मा बसथे, गिधवा मोरो गाँव।।

‎गाँव मोर हे गिधवा सुघ्घर, सरग इही बन जाय।
‎बोली बोलय छत्तीसगढ़ी, सबके मन ला भाय।।

‎रचनाकार- हेमलाल साहू
‎गाँव - गिधवा, जिला बेमेतरा


तुरते ताही

‎गिधवा मोरो गाँव

‎गिधवा मोरो गाँव।। ‎ ‎करिया माटी के चिन्हारी, बर पीपर के छाँव। ‎धरती महतारी के अँचरा, गिधवा मोरो गाँव।। ‎ ‎महमाया दाई के किरपा, अन्न...