जय माहामाया दाई।
जय जय माहामाया दाई।
विनती सुनले मोरो माई।
तँय तरिया के पार विराजै।
सोन के मुकुट हवय सुहाजै।।।
नर नारी महिमा ला गावय।
दाई सबला संबल बाटय।
आवय सब जन तोर दुआरी।
संकट-विपदा हर लेथस सारी
दुर्गा काली लक्ष्मी दाई।
सब जन बर हवस सहाई।
सबो पुकारे ज्ञानी ध्यानी।
तोर नाव ले माता रानी।।
सब जन के तैं महतारी।
दीन दुखी मन के रखवारी।
जग मा सबसे हावस न्यारी।
हे गौरी अम्बे राज दुलारी।।
रचनाकार - हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा
जनम जनम के बंधना, मया प्रीत के छाँव। भुइँया के बेटा हरव, जेकर महिमा गाव।। मोर छत्तीसगढ़ी रचना कोठी।
7 अक्टू॰ 2015
जय महामाया दाई ( हेम के चौपाई छंद)
गणपति वंदना(हेम के सरसी छंद)
गणपति वंदना
(हेम के सरसी छंद)
गूँजत हावय जयकारा,
गणपति बाबा तोर।
साँझ बिहनिया ले पूजा के,
मचथे भारी सोर।।
भादो मास शुक्ल चउथी मा,
धरिस जगत अवतार।
बुद्धि-शक्ति के दाता गणपति,
जग के तारनहार।।
शिव शंकर अउ उमा पार्वती,
दाई-बाबू तोर।
एकदंत अउ दयावंत हा,
पहिली पूजा तोर।।
सजे-धजे गद्दी मा बइठे,
किसम-किसम के रंग।
गाँव-गाँव अउ गली-गली मा,
रमथे मुसवा संग।।
हाथी कस लम्मा सूँड़ हवे,
बड़का भारी पेट।
भोग लगे लड्डू-मोदक के,
चढ़े मया के भेंट।।
करथें सेउक सेवा मन ले,
बाजय मंजीरा-ढोल।
गणपति के महिमा ला गावैं,
मन के आपा खोल।।
सुरता के गठरी ला राखँव,
बाँध मया के गाँठ।
रिद्धि-सिद्धि संग तोर चरनन,
करहूँ पूजा-पाठ।।
आके हरबे गणपति बाबा,
सब्बो पीरा मोर।
कोरी-कोरी नरियर-खीरा,
तोला चढ़ावँ जोर।।
रचनाकार — हेमलाल साहू
गाँव–गिधवा, जिला–बेमेतरा (छ.ग.)
6 अक्टू॰ 2015
गुरतुर बोली के मया— हेम के रोला छंद —
गुरतुर बोली के मया
— हेम के रोला छंद —
तरिया-नदिया तीर, गूँजथे हँसी-ठिठोली।
मया भरिस संसार, मोह ले गुरतुर बोली।।
बसगे मुखड़ा तोर, मया ला करथस भारी।
नैना भीतर रोज, तोर झलकय उजियारी।।
बोली गुरतुर तोर, मोर हिरदे धड़कावय।
चंदैनी कस रूप, देख नयना मोहावय।
चंदा के अंजोर, परे ले मन अकुलावय।
अंतस पीरा जाग, तोर सुध रोज सतावय।।
रचनाकार – हेमलाल साहू
गाँव – गिधवा, जिला – बेमेतरा
गुरतुर बोली के मया, महके पसरा गंध।
लिखथौं माटी रंग ले, मोर मयारू छंद।।
तुरते ताही
धरहूँ माटी भेस 🌿
धरके माटी भेस 🌿 चिमनी के बाती कस जरके, अँधियार ला हरावँ। दया-मया के आखर भर के, सबके बात सुनावँ।। छत्तीसगढ़ी के माटी मा, अपन पसीन...
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बाबा घासीदास गा, तोर आय हव द्वार। तँय हर दीया ज्ञान के, मोरो मन मा बार।। निचट अज्ञानी मँय हवव, बता ज्ञान के सार। बाबा अड़हा जान हव, जग ले मोल...
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ढोलक तबला थाप मा, बाजय मांदर संग। नाचय साधक साधके, देखव पन्थी रंग।। बाबा घासी दास के, करथे सुघ्घर गान। गावय महिमा देखले, गुरु के करत बखान।। ...
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निकले वापस फेर ना, आवय तोर जुबान। जइसे निकले तीर ले, आवय नहीं कमान।। आवय नहीं कमान, बात ला छेड़व गुनके। शारद दे आशीष, शब्द ला रखलव चु...