30 जुल॰ 2026

‎मोर मया के किस्सा (हेम के सार छंद)‎

‎हास्य कविता 
‎मोर मया के किस्सा (हेम के सार छंद)
‎एक्के झन हे मोर मयारू, सुरता आवय रतिया।
‎सुनलव मोर मया के किस्सा, नाव हवे फुलमतिया।।
‎नान-नान चुन्दी कहिके, मोला देख लजाथे।
‎गुरतुर-गुरतुर गोठ सुनाके, हौले पास बुलाथे।।
‎सुघ्घर मुखड़ा अपन देख के, अब्बड़ ओ इतराथे।
‎गाँव-गली के टूरा जम्मो, मुस्की मा भरमाथें।।
‎घूमत-घूमत संग हाट मा, कहिथे– चूड़ी भाथे।
‎सुनतें ही दाम दुकनिया के, जिवरा मोर कपाथे।।
‎का ला कइसे बताव संगी, चढ़गे मया खुमारी।
‎ओकर संगे घूम-घूम के, छुटगे खेती-बारी।।
‎नवा-नवा ले सिंगार करय, सुरता मोर जगाथे।
‎ओकर एक्के मुस्की देखत, मन मोरो हरसाथे।।
‎रोज नवा फरमाइस करथे, हँसके बात बनाथे।
‎नखरा ओकर देखत-देखत, जेब मोर खुल जाथे।।
‎पड़गे हव टूरी के चक्कर, कइसे मोला फाँसिस।
‎देखत-देखत गिरेंव भरसा, लोग-बाग मन हाँसिस।।
‎मोरो कविता सुनके ओहर, हौले-हौले मुस्काथे।
‎गलत लिखें मा अँगरी धरके, मोला सही बताथे।।
‎दुख-सुख मा बनके सँगवारी, हिम्मत मोर बढ़ाथे।
‎अँधियारी जिनगी के रद्दा, दीया बन उजियाथे।।
‎कहिथे– "खर्चा कम करबे जी", मोला रोज सिखाथे।
‎बजार पहुँचत पाँच मिनट मा, दू झोला भर आथे।।
‎ओकर बनके मँय दीवाना, होगे हव मस्ताना।
‎टूरी कहिस– छोड़ कविता ला, कमई अपन दिखाना।।
‎मँय कहेंव– मेहनत घलो करहूँ, कविता नइ बिसराहूँ।
‎मया संग जिनगी गढ़के, दुनिया ला हँसवाहूँ।।
‎रचनाकार -हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा 

28 जुल॰ 2026

‎(हेम के हास्य कविता) ‎महँगाई के हाट‎

‎हेम के हास्य कविता 
‎महँगाई के हाट
‎लम्बा लिस्ट धराके बाई,
‎भेजिस मोला हाट।
‎जेब टटोलत पैसा गिनतें,
‎निकरेंव अपन बाट।।
‎पहिली गे हौं पताल तिर मा,
‎दिखे लाल मुस्कात।
‎सौ रुपिया किलो भाव सुन, 
‎जीव मोर अकुलात।।
‎मँय कहेंव, "बेचे बर हे या,
‎मंदिर चढ़ाव, बाप?"।
‎कहिस दुकनिया – नइ लेना हे,
‎ता रद्दा ले नाप।।
‎मिरचा नइहे एक्को तीखा,
‎तीखा ओकर भाव।
‎धनिया रानी बन के बइठे,
‎जेब कहिस – घर जाव।।
‎देखव पियाज आँख मटकावय,
‎चढ़के भाव अगास।
‎तेल के भाव सुनतें मोरो,
‎जेब धलिस उपवास।। 
‎सबले बड़का मजाक ता ए,
‎देख हँसी मा रोन।।
‎बेचे किसान दस रुपिया मा,
‎हमन खरीदन सोन।।
‎झोला आइस खाली-खाली,
‎झोला घलो लजाय।
‎फूट परिस बाई के गुस्सा, 
‎बघवा कस गुर्राय।।
‎बाई कहिथे – बिना साग के,
‎चलही का घर-बार।
‎जेब मा एक कौड़ी नइहे,
‎जीना हे दुसवार।। 
‎रचनाकार – हेमलाल साहू
‎गाँव – गिधवा, जिला – बेमेतरा

26 जुल॰ 2026

हेम के दोहे व्यंग्य के बान

‎हेम के दोहे व्यंग्य के बान 
‎राजनीति मा दोगला, लबरा मन के राज।
‎आँखी रहिके अंधरा, होगे हमर समाज।।
‎मनखेपन बिकगे इहाँ, स्वारथ के व्यापार।
‎अपन नाव चमकाय बर, दूसर के हक मार।।
‎ताक लगाये चील जस, आँखी अपन गड़ाय।
‎मउका पाय शिकार ला, झपट्टा मार उड़ाय।।
‎भारी पलड़ा नोट के, न्याय बनय व्यापार।
‎सच के खाली हाथ हे, झूठ सजय दरबार।।
‎धरम करम के ओट मा, ठगथे जन बिसवास। 
‎साधु भेस मा कोकड़ा, लूटत जन के आस।। 
‎रचनाकार-हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा।

19 जून 2026

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला)

‎हेम के दोहे (बाल जनऊला)
‎नाच नचावँन अंगरी, काम सबो के आँन।
‎सारी जग के बात ला, ले पहुँचावँन कान।।
‎संग दिखे अंजोर मा, फेर चलय ना साँस।
‎हाथ लगा आवय नहीं, अंधियार मा नास।।
‎बिन संगी आधार ना, जोड़ी बिन बेकार।
‎पहरा देवय बैठ के, असली पहरेदार।।
‎बिन बोले पहिचान ले, पावय लाड दुलार।
‎चोर उचक्का देख के, भागय उल्टा द्वार।।
‎एक गोल डिब्बा भरे, बारहठन के अंग।
‎तीन सिपाही सँग चले, चढ़े समे के रंग।।
‎पन्ना अपन समेट के, भर रखथे भंडार।
‎मोती दाना खोज के, मन के दीया बार।।
‎गार पसीना सींचथे, उठथे होत बिहान।
‎लावय हरियर सोनहा, कोन हरे पहिचान।।
‎हरियर थाली ले भरे, पहिरे बाली सोन।
‎चार मुड़ा ले डाड़ हे, बता सखी ये कोन।।
‎जिनगी चलथे साथ मा, जेकर धरके संग।
‎आवय जावय रोज के, अपन चढ़ावय रंग।।
‎नान्हे दाना पेट मा, धर रखथे जग छाँव।
‎बड़का हो फल-फूल दे, बूझव संगी नाँव।।
‎उत्तर:-1. मोबाइल, 2. छइहाँ (परछाई), 3. तारा-कूची (ताला-चाबी), 4. कुकुर (कुत्ता), 5. घड़ी, 6. पोथी (किताब), 7. किसान, 8. खेती-खार (खेत-खलिहान), 9. दिन-रात, 10. बीजा (बीज)
‎रचनाकार - हेमलाल साहू
‎चिरई के गाँव - गिधवा, जिला बेमेतरा 

15 जून 2026

‎गिधवा मोरो गाँव





‎गिधवा मोरो गाँव।।


‎करिया माटी के चिन्हारी, बर पीपर के छाँव।

‎धरती महतारी के अँचरा, गिधवा मोरो गाँव।।

‎महमाया दाई के किरपा, अन्न-धान्य भंडार।
‎नीम छाँव मा बइठे हावय, बड़का तरिया पार।।

‎तरिया नरवा निरमल पानी, झलमल बहिथे धार।
‎कलकल करथे बगरत पानी, सींचय खेत खार।।

‎रुख राई ले धरती दाई, अपन करय सिंगार।
‎हाँसत हवे फूल फुलवारी, महकय नवा बहार।।

‎छोट बड़े सब चिरई चुरगुन, गिधवा मा सकलाय।
‎गुरतुर गुरतुर गीत सुनाके, सबके मन हरसाय।।

‎हावय तरिया अउ बाँधा मा, चिरई मन के ठाँव। 
‎बाम्हन चिरई अगास उड़थे, बनकुकरा दे बाँव।।

‎नीलकंठ मारे झपटा ला, चमके नील परेव। 
‎रंग बिरंगी आनी - बानी, चिरई मन के नेव।।

‎देशी संग बिदेशी चिरई, किसम किसम के आँव।
‎जेकर किस्सा कहनी बगरे, दुरिहा दुरिहा गाँव।।

‎हरियर चुनरी ओढ़य सुग्घर, लहलय खेती खार।
‎छावय घर घर मा खुशिहाली, बसे सुखी संसार।।

‎रंग रंग के भाजी पाला, उगथे बखरी बाग।
‎चेच अमारी पटवा खेड़ा, खावय भाजी साग।।

‎बहा पसीना खेत खार मा, करथे हरियर बाग।
‎बाँधे पगड़ी करय किसानी, सबके जागे भाग।।

‎दाई काकी भौजी बहनी, करथे मया दुलार।
‎बबा कका अउ भैया बाबू, हिम्मत दैय अपार।।

‎दू पैसा के खातिर जावय, सबो शहर के ओर
‎लहुटय घर तिहार के बेरा, बाँध मया के डोर।।

‎सुम्मत के रस्ता ला चुनके, चलथें सब परिवार।
‎समरसता के दीया जलथे, जगमग हो घर बार।।

‎सुवा ददरिया राग भरथरी, गावे एक्के संग। 
‎राउत पंथी करमा नाचय, दिखथे एक्के रंग।।

‎माटी के ये दया मया ले, गढ़े गाँव के ठाँव।
‎मन के मंदिर मा बसथे, गिधवा मोरो गाँव।।

‎गाँव मोर हे गिधवा सुघ्घर, सरग इही बन जाय।
‎बोली बोलय छत्तीसगढ़ी, सबके मन ला भाय।।

‎रचनाकार- हेमलाल साहू
‎गाँव - गिधवा, जिला बेमेतरा


27 मई 2026

सीखव गिनती

‎*सीखव गिनती*
‎आवव संगी सीखव गिनती।  
‎मुनिया बबलू करथे बिनती।।  
‎एक मया के ममता दाई।
‎दूध पान मा हवय भलाई।।
‎दू आँखी मा देखे मुनिया।  
‎रंग बिरंगी हावय दुनिया।।  
‎तीन रंग मा सजे तिरंगा।
‎देश प्रेम अउ हे मन चंगा।।
‎चार दिशा के अलग कहानी।  
‎चार महीना बरसा पानी।।
‎पाँच उंगरी एक हथेली।
‎मया-दया ला बाँट सहेली।
‎छह ऋतु आवय बारी-बारी।  
‎ये भुइयाँ के हमन पुजारी।।
‎सात सुरों मा गीत बनालव।
‎पेटी तबला संग बजालव।।
‎आठ पाँव के मकड़ी रानी।
‎जाल बुनय सारी जिनगानी।।
‎नौ ग्रह ऊपर चमकय दमकय।
‎आसमान मा सुग्घर लटकय।।
‎दस उँगरी दू हाथ लगालव।
‎एक संग मिलके काम करालव ।।
‎-हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा

25 मई 2026

हेम के कुंडलियाँ

हेम के कुंडलियाँ महँगाई 


‎घर के मुखिया आलसी, बन बइठे सरकार।
घूमे देश बिदेश ला, बेच अपन घर द्वार।।
बेच अपन घर द्वार, छाय घर मा कंगाली।
‎बढ़े जिनिस के भाव, जेब हर होगे खाली।।
‎बाढ़य करजा रोज, कहाँ हे अच्छा दिन हर।
‎आँखी उँगरी डार, देख बइठे मुखिया घर।।
‎-हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा 

तुरते ताही

‎मोर मया के किस्सा (हेम के सार छंद)‎

‎हास्य कविता  ‎मोर मया के किस्सा (हेम के सार छंद) ‎ ‎एक्के झन हे मोर मयारू, सुरता आवय रतिया। ‎सुनलव मोर मया के किस्सा, नाव हवे फुलमतिया।। ‎ ...