जनम जनम के बंधना, मया प्रीत के छाँव। भुइँया के बेटा हरव, जेकर महिमा गाव।। मोर छत्तीसगढ़ी रचना कोठी।
9 दिस॰ 2015
संत गुरु घासीदास (आल्हा छंद)
हेम के दोहे बिहान के उजियार
हेम के दोहे
बिहान के उजियार
चीं चीं होत बिहान ले, चिरई करत पुकार।
उगत हे सुरुज देवता, झटकन आँख उघार।।
भोर बिहान मनखे कहें, जय जय सीताराम।
उवत सुरुज ला देखके, सब करथे परनाम।।
जल्दी करहूँ काम ला, टारव झन इक काम।
भाग्य मेहनत ले बने, आलस ले बदनाम।।
रचनाकार-हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा
गुरुवर (हेम के दोहे)
लुवई मिसई (हेम के दोहे)
कार्तिक अघ्घन पूस मा, लुवई मिसई आय।
मिले नहीं आराम हा, कसके रोज कमाय।।
धरके जावय हंसिया, खेत लुये ला धान।
पाही पाही धर लुये, करपा माढ़य घान।।
पूरा लाने धान के, डोरी गजब बनाय।
करपा लान सकेल के, बोझा बाँध बनाय।।
बइला गाड़ी धान भर, बोझा बोझा जोर।
मेड़ पार ला खेत के, लावन रावन फोर।।
गाड़ी ला कोठार मा, लान खड़ा कर तीर।
सुघ्घर खरही गाँज ले, मढ़ा मढ़ा के धीर।।
छोल चाच चतवार के, सुघ्घर हवे बनाय।
खवरावय कोठार झन, गोबर लेप चटाय।।
गोबर पानी डार के, लिप ले तँय कोठार।
झेल कलारी हाथ मा, पैर धान के डार।।
बेलन अउ दवरी चले, बइला ला खेदार।
बीच बीच मा कोड़ के, बने धान ला झार।।
पैरा सबो निकाल के, गोल गोल के गाँज।
पैरावट सुघ्घर दिखे, रखले भइया साज।।
जम्मो धान सकेल के, एक जगा मा लान।
पँखा लगा के तँय उड़ा, बाचय दाना धान।।
बोरा भरके धान ला, घर के कोठी डार।
लक्ष्मी के पूजा करें, घर भर दे भण्डार।।
-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तह. नवागढ़, जिला बेमेतरा (छ. ग.)
7 अक्टू॰ 2015
जय महामाया दाई ( हेम के चौपाई छंद)
जय माहामाया दाई।
जय जय माहामाया दाई।
विनती सुनले मोरो माई।
तँय तरिया के पार विराजै।
सोन के मुकुट हवय सुहाजै।।।
नर नारी महिमा ला गावय।
दाई सबला संबल बाटय।
आवय सब जन तोर दुआरी।
संकट-विपदा हर लेथस सारी
दुर्गा काली लक्ष्मी दाई।
सब जन बर हवस सहाई।
सबो पुकारे ज्ञानी ध्यानी।
तोर नाव ले माता रानी।।
सब जन के तैं महतारी।
दीन दुखी मन के रखवारी।
जग मा सबसे हावस न्यारी।
हे गौरी अम्बे राज दुलारी।।
रचनाकार - हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा
गणपति वंदना(हेम के सरसी छंद)
6 अक्टू॰ 2015
गुरतुर बोली के मया— हेम के रोला छंद —
28 अग॰ 2015
राखी के मया ( हेम के सार छंद)
हेम के सार छंद
मया के राखी
भाई अउ बहनी के अटूट,
नेह-मया बगरावय।
सजे दुकनिया सबो बाट मा,
राखी सबों मनावय।।
मोर गोड़ हा खजुवावत हे,
समझे संगी भोला।
बहिनी मोर सुरता करत हे,
एही लगथे मोला।।
बार-बार आके कँउवा मन,
सगा संदेश लावय।
हरियर सावन देखत-देखत,
बहिनी सुरता आवय।।
राखी धरे निहारत बहिनी,
भाई अपन अगोरय।
बार-बार रस्ता ला देखत,
भाई राखी जोहय।।
गावत रहिथे चिरई-चिरगुन,
गुरतुर बोली बोले।
बहिनी तोर बाट ले आवत,
रखले दुआर खोले।।
बारह महिना रद्दा जोहत,
पथरागे हे आँखी।
बहिनी पहुँचिस तोर दुआरी,
बाँध मया के राखी।।
रचनाकार-हेमलाल साहू
गाँव-गिधवा, जिला बेमेतरा
मया करइया (हेम के सार छंद)
23 जुल॰ 2015
ओ माटी के मितवा भैया (हेम के आल्हा छंद)
हेम के आल्हा छंद
माटी के मितवा भैया
ओ माटी के मितवा भैया,
तँय हर धरती के भगवान।
नागर बइला संग तुतारी,
हावय तोर जगत पहिचान।।
अरे तता धुन गजब सुनाथे,
मुख मा भरे ददरिया राग।
बासी चटनी नून सुहावय,
जागय रे जिनगी के भाग।।
माटी के कोरा मा खेलत,
सेवा ओकर रोज निभाय।
अपने जाँगर हवे भरोसा,
दया-मया ला सबके पाय।।
दया-मया के भाव भरे हे,
सादा सिधवा रहय किसान।
गार पसीना धरती सींचय,
लहलहाय गा ओकर धान।।
सुतउठ के धरती ला सुमिरे,
सुरुज देव ला माथ नवाय।
सुन चिरई के गुरतुर बोली,
जिनगी भर जे खेत कमाय।।
भूख-प्यास सब्बो सहिथे,
सहिथे दिनभर कतको झाँझ।
काम-बुता मा कहाँ पता हे,
दिन बुड़के हो जावय साँझ।।
दिनभर काम-बुता हा पुरथे,
बस रतिहा मा मिलथे छाँव।
सुते उठे के पहिली परथस,
ये भुइँया के तँय हर पाँव।।
पेर-पेर के जाँगर ला तँय,
सोन सही उपजाथस धान।
जग के पालन तही करइया,
माटी के तँय हरस मितान।।
रचनाकार -हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा
तुरते ताही
मोर मया के किस्सा (हेम के सार छंद)
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निकले वापस फेर ना, आवय तोर जुबान। जइसे निकले तीर ले, आवय नहीं कमान।। आवय नहीं कमान, बात ला छेड़व गुनके। शारद दे आशीष, शब्द ला रखलव चु...
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