9 दिस॰ 2015

संत गुरु घासीदास (आल्हा छंद)

















संत महात्मा ये भुइँया के, सुघ्घर लाइस नवा उजास।
माता रहिस हवे अमरौतिन, ददा रहिस हे महँगू दास।

माह दिसम्बर रहिस अठारह, सन सतरा सौ छप्पन जान।
लेइस घासीदास जन्म ला, मनखे बर बनके भगवान।।
 
बाबा सत के रहिस पुजारी, बनिस गिरौदपुरी हा धाम।
होगिस हावय पावन भुइँया, सबो डहर गूँजय सतनाम।।

बाबा तँय अड़हा बइला मा, सुघ्घर गुन हवस जगायेंव।
काँटे साप बुधारू ला ता, करके चमत्कार जियायेंव।।

बइठे छाता के पहाड़ मा, बाबा अपन धुनी ला रामाय।
सत रद्दा मा चलके बाबा, नाम जगत मा सत फैलाय।।

अवरा धवरा पेड़ मेर तँय, बइठ ज्ञान ला सुघ्घर पाय।
मनखे मनखे समान हे कहि, भेद भाव ला हवस मिटाय।।

माह दिसम्बर अमर जयंती, गाँव गाँव मा तोर मनाय।
जैतखाम हा तोर निसानी, सत के झण्डा ला फहराय।

-हेमलाल साहू 
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तह. नवागढ़, जिला बेमेतरा (छ. ग.)

‎हेम के दोहे ‎‎बिहान के उजियार‎

‎हेम के दोहे 

‎बिहान के उजियार

‎चीं चीं होत बिहान ले, चिरई करत पुकार।
‎उगत हे सुरुज देवता, झटकन आँख उघार।।

‎भोर बिहान मनखे कहें, जय जय सीताराम।
‎उवत सुरुज ला देखके, सब करथे परनाम।।

‎जल्दी करहूँ काम ला, टारव झन इक काम।
‎भाग्य मेहनत ले बने, आलस ले बदनाम।।

‎रचनाकार-हेमलाल साहू
‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा

 

गुरुवर (हेम के दोहे)

 देवय गुरु आशीष ला, लेलव बढ़िया ज्ञान।
जिनगी हो जाही सुखी, करले गुरु के ध्यान।।

सच्चा गुरुवर जौन हे, चेला ना भटकाय।
मन के दुविधा दूर कर, शंका दूर भगाय।।

गुरु अच्छा तँय बना, मन मा सोच बिचार।
जिनगी के नइया लगे, भवसागर से पार।।

गुरुवर कहना मान ले, भटकच नहीं सियान।
मानुष तन तोला मिले, झन कर गरब गुमान।।

-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तह. नवागढ़, जिला बेमेतरा (छ. ग.)

‎🌼 हेम के दोहे 🌼‎दाई-ददा वंदना

‎🌼 हेम के दोहे 🌼
‎दाई-ददा वंदना 
‎दाई बाबू मानथौ, तोला मँय भगवान।
‎जग मा सबले बड़ हवे, तोर मया वरदान।।
‎करहूँ सदा प्रणाम मँय, अपन हाथ ला जोर।
‎चारो तीरथ धाम अस, पूजंव चरन तोर।।
‎पहिली गुरु दाई ददा, खोलय ज्ञान दुआर।
‎सीख देय संस्कार के, मिटथे मन अँधियार।।
‎रचनाकार -हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा 

लुवई मिसई (हेम के दोहे)

कार्तिक अघ्घन पूस मा, लुवई मिसई आय।

मिले नहीं आराम हा, कसके रोज कमाय।।


धरके जावय हंसिया, खेत लुये ला धान।

पाही पाही धर लुये, करपा माढ़य घान।।


पूरा लाने धान के, डोरी गजब बनाय।

करपा लान सकेल के, बोझा बाँध बनाय।।


बइला गाड़ी धान भर, बोझा बोझा जोर।

मेड़ पार ला खेत के, लावन रावन फोर।।


गाड़ी ला कोठार मा, लान खड़ा कर तीर।

सुघ्घर खरही गाँज ले, मढ़ा मढ़ा के धीर।।


छोल चाच चतवार के, सुघ्घर हवे बनाय।

खवरावय कोठार झन, गोबर लेप चटाय।।


गोबर पानी डार के, लिप ले तँय कोठार।

झेल कलारी हाथ मा, पैर धान के डार।।


बेलन अउ दवरी चले, बइला ला खेदार।

बीच बीच मा कोड़ के, बने धान ला झार।।


पैरा सबो निकाल के, गोल गोल के गाँज।

पैरावट सुघ्घर दिखे, रखले भइया साज।।


जम्मो धान सकेल के, एक जगा मा लान।

पँखा लगा के तँय उड़ा, बाचय दाना धान।।


बोरा भरके धान ला, घर के कोठी डार।

लक्ष्मी के पूजा करें, घर भर दे भण्डार।।

-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तह. नवागढ़, जिला बेमेतरा (छ. ग.)

7 अक्टू॰ 2015

जय महामाया दाई ( हेम के चौपाई छंद)

‎ जय माहामाया दाई।

‎जय जय माहामाया दाई।
‎विनती सुनले मोरो माई।
‎तँय तरिया के पार विराजै।
‎सोन के मुकुट हवय सुहाजै।।।

‎नर नारी महिमा ला गावय।
‎दाई सबला संबल बाटय।
‎आवय सब जन तोर दुआरी।
‎संकट-विपदा हर लेथस सारी

‎दुर्गा काली लक्ष्मी दाई।
‎सब जन बर हवस सहाई।
‎सबो पुकारे ज्ञानी ध्यानी।
‎तोर नाव ले माता रानी।।

‎सब जन के तैं महतारी।
‎दीन दुखी मन के रखवारी।
‎जग मा सबसे हावस न्यारी।
‎हे गौरी अम्बे राज दुलारी।।

‎रचनाकार - हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा


‎गणपति वंदना‎(हेम के सरसी छंद)‎

‎गणपति वंदना
‎(हेम के सरसी छंद)
‎गूँजत हावय जयकारा,
‎गणपति बाबा तोर।
‎साँझ बिहनिया ले पूजा के,
‎मचथे भारी सोर।।
‎भादो मास शुक्ल चउथी मा,
‎धरिस जगत अवतार।
‎बुद्धि-शक्ति के दाता गणपति,
‎जग के तारनहार।।
‎शिव शंकर अउ उमा पार्वती,
‎दाई-बाबू तोर।
‎एकदंत अउ दयावंत हा,
‎पहिली पूजा तोर।।
‎सजे-धजे गद्दी मा बइठे,
‎किसम-किसम के रंग।
‎गाँव-गाँव अउ गली-गली मा, 
‎रमथे मुसवा संग।।
‎हाथी कस लम्मा सूँड़ हवे,
‎बड़का भारी पेट।
‎भोग लगे लड्डू-मोदक के,
‎चढ़े मया के भेंट।।
‎करथें सेउक सेवा मन ले,
‎बाजय मंजीरा-ढोल।
‎गणपति के महिमा ला गावैं,
‎मन के आपा खोल।।
‎सुरता के गठरी ला राखँव,
‎बाँध मया के गाँठ।
‎रिद्धि-सिद्धि संग तोर चरनन,
‎करहूँ पूजा-पाठ।।
‎आके हरबे गणपति बाबा,
‎सब्बो पीरा मोर।
‎कोरी-कोरी नरियर-खीरा,
‎तोला चढ़ावँ जोर।।
‎रचनाकार — हेमलाल साहू 
‎गाँव–गिधवा, जिला–बेमेतरा (छ.ग.)

6 अक्टू॰ 2015

‎गुरतुर बोली के मया‎‎— हेम के रोला छंद —‎

‎गुरतुर बोली के मया
‎— हेम के रोला छंद —
‎तरिया-नदिया तीर, गूँजथे हँसी-ठिठोली।
‎मया भरिस संसार, मोह ले गुरतुर बोली।।
‎बसगे मुखड़ा तोर, मया ला करथस भारी।
‎नैना भीतर रोज, तोर झलकय उजियारी।।
‎बोली गुरतुर तोर, मोर हिरदे धड़कावय।
‎चंदैनी कस रूप, देख नयना मोहावय।
‎चंदा के अंजोर, परे ले मन अकुलावय।
‎अंतस पीरा जाग, तोर सुध रोज सतावय।।
‎रचनाकार – हेमलाल साहू
‎गाँव – गिधवा, जिला – बेमेतरा
‎गुरतुर बोली के मया, महके पसरा गंध।
‎लिखथौं माटी रंग ले, मोर मयारू छंद।।

28 अग॰ 2015

राखी के मया ( हेम के सार छंद)

‎हेम के सार छंद
‎मया के राखी

‎भाई अउ बहनी के अटूट,
‎नेह-मया बगरावय।
‎सजे दुकनिया सबो बाट मा,
‎राखी सबों मनावय।।

‎मोर गोड़ हा खजुवावत हे,
‎समझे संगी भोला।
‎बहिनी मोर सुरता करत हे,
‎एही लगथे मोला।।

‎बार-बार आके कँउवा मन,
‎सगा संदेश लावय।
‎हरियर सावन देखत-देखत,
‎बहिनी सुरता आवय।।

‎राखी धरे निहारत बहिनी,
‎भाई अपन अगोरय।
‎बार-बार रस्ता ला देखत,
‎भाई राखी जोहय।।

‎गावत रहिथे चिरई-चिरगुन,
‎गुरतुर बोली बोले।
‎बहिनी तोर बाट ले आवत,
‎रखले दुआर खोले।।

‎बारह महिना रद्दा जोहत,
‎पथरागे हे आँखी।
‎बहिनी पहुँचिस तोर दुआरी,
‎बाँध मया के राखी।।

‎रचनाकार-हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला बेमेतरा

मया करइया (हेम के सार छंद)

‎ मया करइया (हेम के सार छंद)
‎मोर एक झन मया करइया, 
‎लेवय सुध अधिरतिया।
‎आवव सुनलव ओकर कहनी, 
‎नाव हवे फुलमतिया।।
‎नान-नान चुन्दी हे कहिके, 
‎मोला देख लजाथे।
‎मीठ-मीठ ओ बात बना के, 
‎मोला रोज फसाथे।।
‎दिखथव सुघ्घर कहिके ओहर,
‎अब्बड़ जी इतराथे।
‎गाँव-गली के जवान मन ला,
‎हँस-हँस खूब रिझाथे।।
‎नवा-नवा ले सिंगार करय, 
‎सुरता मोर जगाथे।
‎अपन सहेली कन जाके ओ, 
‎रंग-रंग बतियाथे।।
‎काला कइसे बताव संगी, 
‎चढ़गे मया खुमारी।
‎रोज बहाना खोजत रहिथे, 
‎मया बनिस बीमारी।।
‎पड़गे हव टूरी के चक्कर, 
‎कइसे मोला फाँसिस।
‎गली-गली मा देख-देख के, 
‎लोगन मोला हाँसिस।।
‎ओकर बनगे हव दीवाना, 
‎बनके मँय मस्ताना।
‎टूरी हाँसत मोला कहिथे, 
‎कविता तोर सुनाना।।
‎रचनाकार - हेमलाल साहू
‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा 

23 जुल॰ 2015

ओ माटी के मितवा भैया (हेम के आल्हा छंद)

‎हेम के आल्हा छंद
माटी के मितवा भैया

‎ओ माटी के मितवा भैया,
तँय हर धरती के भगवान।
‎नागर बइला संग तुतारी,
हावय तोर जगत पहिचान।।

‎अरे तता धुन गजब सुनाथे,
मुख मा भरे ददरिया राग।
‎बासी चटनी नून सुहावय,
जागय रे जिनगी के भाग।।

‎माटी के कोरा मा खेलत,
सेवा ओकर रोज निभाय।
‎अपने जाँगर हवे भरोसा,
दया-मया ला सबके पाय।।

‎दया-मया के भाव भरे हे, 
सादा सिधवा रहय किसान।
‎गार पसीना धरती सींचय,
लहलहाय गा ओकर धान।।

‎सुतउठ के धरती ला सुमिरे,
सुरुज देव ला माथ नवाय।
‎सुन चिरई के गुरतुर बोली,
जिनगी भर जे खेत कमाय।।

‎भूख-प्यास सब्बो सहिथे,
सहिथे दिनभर कतको झाँझ।
‎काम-बुता मा कहाँ पता हे,
दिन बुड़के हो जावय साँझ।।

‎दिनभर काम-बुता हा पुरथे,
बस रतिहा मा मिलथे छाँव।
‎सुते उठे के पहिली परथस,
ये भुइँया के तँय हर पाँव।।

‎पेर-पेर के जाँगर ला तँय,
सोन सही उपजाथस धान।
‎जग के पालन तही करइया,
माटी के तँय हरस मितान।।

‎रचनाकार -हेमलाल साहू
‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा

तुरते ताही

‎मोर मया के किस्सा (हेम के सार छंद)‎

‎हास्य कविता  ‎मोर मया के किस्सा (हेम के सार छंद) ‎ ‎एक्के झन हे मोर मयारू, सुरता आवय रतिया। ‎सुनलव मोर मया के किस्सा, नाव हवे फुलमतिया।। ‎ ...