17 फ़र॰ 2017

@बसंत @(आल्हा छन्द)

गावत हव महिमा बसंत के, कइथे जेला जग रितु राज।
चार मास के जेकर शासन, सुघ्घर करथे जग मा काज।।

गावत हवै कोयली महिमा,  कुह कुह के सुनले तँय तान।
हाँसत हावय रुख राई हा, आगे जग मा नवा बिहान।।

करथे स्वागत भँवरा भइया, खिलथे किसम किसम के फूल।
बनके प्रेमी जावत हावय, दुःख दरद ला अपने भूल।।

धरती दाई करथे सुघ्घर, हरियर रूप धरै श्रृंगार।
चारों मुड़ा खुसी हा छावय, सुघ्घर आगे देख बहार।।

लाली लाली परसा फूले, आमा हा सुघ्घर मउराय।
चिरई चिरगुन खेती घूमे, देख सबो के मन हरसाय।।

खेलत हावय रंग गुलाले, देख उड़त हे फाग महंत।
नाचय खेलत अउ कूदत हे, गावत हावय गीत बसंत।।

पींयर पींयर सरसों फूले, देख रूप  ला मन भाय।
पीरा मा रोवत प्रेमी हा, कहाँ प्रेमिका हवै लुकाय।।

भागे जाड़ा दिन हा भैया, सूरुज हा खेलय गा खेल।
गावत हव महिमा बसंत के, देख मया के भैया मेल।।

- हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा
छत्तीसगढ़, मो. 9977831273

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