29 जुल॰ 2016

कड़ुवा गोठ (हेम के उल्लाला छंद)

जिनगी के तो भोगना, लिखै दियै भगवान हा।

कथनी करनी ला बने, दिखे नहीं इंसान हा।।


आँखी रहिके अंधरा, कइसे बनगे ज्ञान हा।

राज दोगला हर करै, हाँसत हे शैतान हा।।


दुख पीरा ला भोग थे, जिनगी होंगे जंग गा।

मारत हावय अउ मरे, देखव मनखे रंग गा।


कहाँ जियत मा पूछथे, कोनो बेटा बाप ला।

मर जाथे ता धोत हे, मनके अपने पाप ला।।


कलजुग के दुनिया हवे, करै दिखावा लोग हा।

आँसू पइसा मा बिके, अन्तस नइहे सोग  हा।।


-हेमलाल साहू

ग्राम गिधवा, जिला बेमेतरा(छ.ग.)

कोई टिप्पणी नहीं:

तुरते ताही

हेम के दोहे व्यंग्य के बान

‎ ‎हेम के दोहे व्यंग्य के बान  ‎ ‎राजनीति मा दोगला, लबरा मन के राज। ‎आँखी रहिके अंधरा, होगे हमर समाज।। ‎ ‎मनखेपन बिकगे इहाँ, स्वारथ के व्याप...