गुरतुर बोली के मया
— हेम के रोला छंद —
तरिया-नदिया तीर, गूँजथे हँसी-ठिठोली।
मया भरिस संसार, मोह ले गुरतुर बोली।।
बसगे मुखड़ा तोर, मया ला करथस भारी।
नैना भीतर रोज, तोर झलकय उजियारी।।
बोली गुरतुर तोर, मोर हिरदे धड़कावय।
चंदैनी कस रूप, देख नयना मोहावय।
चंदा के अंजोर, परे ले मन अकुलावय।
अंतस पीरा जाग, तोर सुध रोज सतावय।।
रचनाकार – हेमलाल साहू
गाँव – गिधवा, जिला – बेमेतरा
गुरतुर बोली के मया, महके पसरा गंध।
लिखथौं माटी रंग ले, मोर मयारू छंद।।
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