6 अक्टू॰ 2015

‎गुरतुर बोली के मया‎‎— हेम के रोला छंद —‎

‎गुरतुर बोली के मया
‎— हेम के रोला छंद —
‎तरिया-नदिया तीर, गूँजथे हँसी-ठिठोली।
‎मया भरिस संसार, मोह ले गुरतुर बोली।।
‎बसगे मुखड़ा तोर, मया ला करथस भारी।
‎नैना भीतर रोज, तोर झलकय उजियारी।।
‎बोली गुरतुर तोर, मोर हिरदे धड़कावय।
‎चंदैनी कस रूप, देख नयना मोहावय।
‎चंदा के अंजोर, परे ले मन अकुलावय।
‎अंतस पीरा जाग, तोर सुध रोज सतावय।।
‎रचनाकार – हेमलाल साहू
‎गाँव – गिधवा, जिला – बेमेतरा
‎गुरतुर बोली के मया, महके पसरा गंध।
‎लिखथौं माटी रंग ले, मोर मयारू छंद।।

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