चिमनी के बाती कस जरके,
अँधियार ला हरावँ।
दया-मया के आखर भर के,
सबके बात सुनावँ।।
छत्तीसगढ़ी के माटी मा,
अपन पसीना गार।
फुलवा बन ममहावत रइहूँ,
काँटा सबो निकार।।
भलई के रस्ता मा हावय,
दुख के खड़े पहाड़।
सच के जांगर ले ओला,
जर ले फेंक उखाड़।।
धधकत कलम अंगरा बनके,
लबरा ला दव लेस।
माटी के पीरा ला हरदव,
धरके माटी भेस।।
रचनाकार - हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला-बेमेतरा
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