गणपति वंदना
(हेम के सरसी छंद)
गूँजत हावय जयकारा,
गणपति बाबा तोर।
साँझ बिहनिया ले पूजा के,
मचथे भारी सोर।।
भादो मास शुक्ल चउथी मा,
धरिस जगत अवतार।
बुद्धि-शक्ति के दाता गणपति,
जग के तारनहार।।
शिव शंकर अउ उमा पार्वती,
दाई-बाबू तोर।
एकदंत अउ दयावंत हा,
पहिली पूजा तोर।।
सजे-धजे गद्दी मा बइठे,
किसम-किसम के रंग।
गाँव-गाँव अउ गली-गली मा,
रमथे मुसवा संग।।
हाथी कस लम्मा सूँड़ हवे,
बड़का भारी पेट।
भोग लगे लड्डू-मोदक के,
चढ़े मया के भेंट।।
करथें सेउक सेवा मन ले,
बाजय मंजीरा-ढोल।
गणपति के महिमा ला गावैं,
मन के आपा खोल।।
सुरता के गठरी ला राखँव,
बाँध मया के गाँठ।
रिद्धि-सिद्धि संग तोर चरनन,
करहूँ पूजा-पाठ।।
आके हरबे गणपति बाबा,
सब्बो पीरा मोर।
कोरी-कोरी नरियर-खीरा,
तोला चढ़ावँ जोर।।
रचनाकार — हेमलाल साहू
गाँव–गिधवा, जिला–बेमेतरा (छ.ग.)
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