28 अग॰ 2015

मया करइया (हेम के सार छंद)

‎ मया करइया (हेम के सार छंद)
‎मोर एक झन मया करइया, 
‎लेवय सुध अधिरतिया।
‎आवव सुनलव ओकर कहनी, 
‎नाव हवे फुलमतिया।।
‎नान-नान चुन्दी हे कहिके, 
‎मोला देख लजाथे।
‎मीठ-मीठ ओ बात बना के, 
‎मोला रोज फसाथे।।
‎दिखथव सुघ्घर कहिके ओहर,
‎अब्बड़ जी इतराथे।
‎गाँव-गली के जवान मन ला,
‎हँस-हँस खूब रिझाथे।।
‎नवा-नवा ले सिंगार करय, 
‎सुरता मोर जगाथे।
‎अपन सहेली कन जाके ओ, 
‎रंग-रंग बतियाथे।।
‎काला कइसे बताव संगी, 
‎चढ़गे मया खुमारी।
‎रोज बहाना खोजत रहिथे, 
‎मया बनिस बीमारी।।
‎पड़गे हव टूरी के चक्कर, 
‎कइसे मोला फाँसिस।
‎गली-गली मा देख-देख के, 
‎लोगन मोला हाँसिस।।
‎ओकर बनगे हव दीवाना, 
‎बनके मँय मस्ताना।
‎टूरी हाँसत मोला कहिथे, 
‎कविता तोर सुनाना।।
‎रचनाकार - हेमलाल साहू
‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा 

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