मया करइया (हेम के सार छंद)
मोर एक झन मया करइया,
लेवय सुध अधिरतिया।
आवव सुनलव ओकर कहनी,
नाव हवे फुलमतिया।।
नान-नान चुन्दी हे कहिके,
मोला देख लजाथे।
मीठ-मीठ ओ बात बना के,
मोला रोज फसाथे।।
दिखथव सुघ्घर कहिके ओहर,
अब्बड़ जी इतराथे।
गाँव-गली के जवान मन ला,
हँस-हँस खूब रिझाथे।।
नवा-नवा ले सिंगार करय,
सुरता मोर जगाथे।
अपन सहेली कन जाके ओ,
रंग-रंग बतियाथे।।
काला कइसे बताव संगी,
चढ़गे मया खुमारी।
रोज बहाना खोजत रहिथे,
मया बनिस बीमारी।।
पड़गे हव टूरी के चक्कर,
कइसे मोला फाँसिस।
गली-गली मा देख-देख के,
लोगन मोला हाँसिस।।
ओकर बनगे हव दीवाना,
बनके मँय मस्ताना।
टूरी हाँसत मोला कहिथे,
कविता तोर सुनाना।।
रचनाकार - हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा
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