26 जुल॰ 2026

हेम के दोहे व्यंग्य के बान

‎
‎हेम के दोहे व्यंग्य के बान 
‎
‎राजनीति मा दोगला, लबरा मन के राज।
‎आँखी रहिके अंधरा, होगे हमर समाज।।
‎
‎मनखेपन बिकगे इहाँ, स्वारथ के व्यापार।
‎अपन नाव चमकाय बर, दूसर के हक मार।।
‎
‎ताक लगाये चील जस, आँखी अपन गड़ाय।
‎मउका पाय शिकार ला, झपट्टा मार उड़ाय।।
‎
‎भारी पलड़ा नोट के, न्याय बनय व्यापार।
‎सच के खाली हाथ हे, झूठ सजय दरबार।।
‎
‎धरम करम के ओट मा, ठगथे जन बिसवास। 
‎साधु भेस मा कोकड़ा, लूटत जन के आस।। 
‎
‎रचनाकार-हेमलाल साहू
‎गाँव-गिधवा, जिला-बेमेतरा।
‎

कोई टिप्पणी नहीं:

तुरते ताही

धरहूँ माटी भेस 🌿

‎धरके माटी भेस 🌿 ‎ ‎चिमनी के बाती कस जरके, ‎अँधियार ला हरावँ। ‎दया-मया के आखर भर के, ‎सबके बात सुनावँ।। ‎ ‎छत्तीसगढ़ी के माटी मा, ‎अपन पसीन...