28 जुल॰ 2026

‎(हेम के हास्य कविता) ‎महँगाई के हाट‎

‎हेम के हास्य कविता 
‎महँगाई के हाट
‎लम्बा लिस्ट धराके बाई,
‎भेजिस मोला हाट।
‎जेब टटोलत पैसा गिनतें,
‎निकरेंव अपन बाट।।
‎पहिली गे हौं पताल तिर मा,
‎दिखे लाल मुस्कात।
‎सौ रुपिया किलो भाव सुन, 
‎जीव मोर अकुलात।।
‎मँय कहेंव, "बेचे बर हे या,
‎मंदिर चढ़ाव, बाप?"।
‎कहिस दुकनिया – नइ लेना हे,
‎ता रद्दा ले नाप।।
‎मिरचा नइहे एक्को तीखा,
‎तीखा ओकर भाव।
‎धनिया रानी बन के बइठे,
‎जेब कहिस – घर जाव।।
‎देखव पियाज आँख मटकावय,
‎चढ़के भाव अगास।
‎तेल के भाव सुनतें मोरो,
‎जेब धलिस उपवास।। 
‎सबले बड़का मजाक ता ए,
‎देख हँसी मा रोन।।
‎बेचे किसान दस रुपिया मा,
‎हमन खरीदन सोन।।
‎झोला आइस खाली-खाली,
‎झोला घलो लजाय।
‎फूट परिस बाई के गुस्सा, 
‎बघवा कस गुर्राय।।
‎बाई कहिथे – बिना साग के,
‎चलही का घर-बार।
‎जेब मा एक कौड़ी नइहे,
‎जीना हे दुसवार।। 
‎रचनाकार – हेमलाल साहू
‎गाँव – गिधवा, जिला – बेमेतरा

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तुरते ताही

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