14 दिस॰ 2016

बारव दीया (हेम के दोहे)

बारव दीया प्रेम के, सुघ्घर कर के दान।

हवे महीना धर्म के, आही घर भगवान।।


आत्मा बिन काया नहीँ, इही जगत के सार।

दीया बाती तेल मिल, करै जगत उजियार।।


माटी के दियना जले, जगत होय अंजोर।

जिनगी के बाती जले, तेल रहत ले मोर।।


आगे धनतेरस हवय, दीया ला घर बार।

लछमी दाई संग मा, लाय नवा उजियार।।

-हेमलाल साहू

ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा

तह. नवागढ़, जिला बेमेतरा(छ. ग.)

2 टिप्‍पणियां:

jayant sahu_जयंत ने कहा…

वाह गजब सुंदर हेम.. लगथे अब आमीर खुसरो के रद्दा म चल पढ़े हव।

राजेश कुमार निषाद ने कहा…

बहुत सुंदर दोहा हेम भाई
बधाई हो

तुरते ताही

धरहूँ माटी भेस 🌿

‎धरके माटी भेस 🌿 ‎ ‎चिमनी के बाती कस जरके, ‎अँधियार ला हरावँ। ‎दया-मया के आखर भर के, ‎सबके बात सुनावँ।। ‎ ‎छत्तीसगढ़ी के माटी मा, ‎अपन पसीन...