13 फ़र॰ 2016

दोगला राज (हेम के कज्जल छंद)

‎हेम के व्यंग्य बान 

‎करय दोगला इहाँ राज। 

‎दू नम्बर ले बढ़य काज।

‎कुर्सी बर बेचथे लाज।

‎नोचय जन के मूल ब्याज।

‎बड़का घूमय इहाँ चोर।

‎शासन बनगे घूसखोर।

‎सच के नइहे इहाँ ठौर।

‎पैसा के दम चलय दौर।।

‎देखत तँय चलबे सियान।

‎मीठा गोठ जहर के बान।

‎मायाजाल ला पहिचान।

‎लूटत हावय बईमान।।

‎झूठ बने सच गा मितान।

‎सच ला मानय झूठ जान।

‎इहाँ सही के न पहचान।

‎सत्ता हर हवय भगवान।।

‎रचनाकार : हेमलाल साहू

‎गाँव : गिधवा, जिला : बेमेतरा


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