23 जुल॰ 2015

ओ माटी के मितवा भैया (हेम के आल्हा छंद)

‎हेम के आल्हा छंद
माटी के मितवा भैया

‎ओ माटी के मितवा भैया,
तँय हर धरती के भगवान।
‎नागर बइला संग तुतारी,
हावय तोर जगत पहिचान।।

‎अरे तता धुन गजब सुनाथे,
मुख मा भरे ददरिया राग।
‎बासी चटनी नून सुहावय,
जागय रे जिनगी के भाग।।

‎माटी के कोरा मा खेलत,
सेवा ओकर रोज निभाय।
‎अपने जाँगर हवे भरोसा,
दया-मया ला सबके पाय।।

‎दया-मया के भाव भरे हे, 
सादा सिधवा रहय किसान।
‎गार पसीना धरती सींचय,
लहलहाय गा ओकर धान।।

‎सुतउठ के धरती ला सुमिरे,
सुरुज देव ला माथ नवाय।
‎सुन चिरई के गुरतुर बोली,
जिनगी भर जे खेत कमाय।।

‎भूख-प्यास सब्बो सहिथे,
सहिथे दिनभर कतको झाँझ।
‎काम-बुता मा कहाँ पता हे,
दिन बुड़के हो जावय साँझ।।

‎दिनभर काम-बुता हा पुरथे,
बस रतिहा मा मिलथे छाँव।
‎सुते उठे के पहिली परथस,
ये भुइँया के तँय हर पाँव।।

‎पेर-पेर के जाँगर ला तँय,
सोन सही उपजाथस धान।
‎जग के पालन तही करइया,
माटी के तँय हरस मितान।।

‎रचनाकार -हेमलाल साहू
‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा

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