18 मार्च 2017

सुन ले मोरे मितवा (सार छंद)

‎सुन ले मोरे मितवा (हेम के सार छंद)


‎सुन साथी रे, सुन साथी रे, सुन ले मोरे मितवा।

‎आ जा रे, आ जा रे मोरे, जनम-जनम के हितवा।।


‎जोहत-जोहत तोर बाट ला, बीतत जाथे दिनवा।

‎तहि मोरे मांग के सिंदूर, तहि चूरी अउ खिनवा।।


‎जग हा सुन्ना मोला लागय, सुरता दिन भर आवय।

‎तोर बिना सब बइरी होगय, कछुच मन नइ भावय।।


‎बोझ लगय जिनगी हा मोरे, दुख के बादर छावय।

‎तरर-तरर आँखी ले पानी, दिन-रात झरन लागय।।


‎मोरे कटत हवय जिनगी हा, तोरे रस्ता जोहत।

‎आस हवय तोरे दरसन के, मन हा मोरे रोवत।।


‎खाना पानी कहाँ सुहावय, जग मा मन नइ भावय।

‎दूखन-भूखन जिनगी कटथे, पगली जगत बुलावय।।


‎हवै ठिकाना का जिनगी के, आजा रे अब जोही।

‎कहाँ लुकागे तय हा बनके,  जग मा रे निरमोही।।


‎रचनाकार -हेमलाल साहू

‎गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा






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