सुन ले मोरे मितवा (हेम के सार छंद)
सुन साथी रे, सुन साथी रे, सुन ले मोरे मितवा।
आ जा रे, आ जा रे मोरे, जनम-जनम के हितवा।।
जोहत-जोहत तोर बाट ला, बीतत जाथे दिनवा।
तहि मोरे मांग के सिंदूर, तहि चूरी अउ खिनवा।।
जग हा सुन्ना मोला लागय, सुरता दिन भर आवय।
तोर बिना सब बइरी होगय, कछुच मन नइ भावय।।
बोझ लगय जिनगी हा मोरे, दुख के बादर छावय।
तरर-तरर आँखी ले पानी, दिन-रात झरन लागय।।
मोरे कटत हवय जिनगी हा, तोरे रस्ता जोहत।
आस हवय तोरे दरसन के, मन हा मोरे रोवत।।
खाना पानी कहाँ सुहावय, जग मा मन नइ भावय।
दूखन-भूखन जिनगी कटथे, पगली जगत बुलावय।।
हवै ठिकाना का जिनगी के, आजा रे अब जोही।
कहाँ लुकागे तय हा बनके, जग मा रे निरमोही।।
रचनाकार -हेमलाल साहू
गाँव - गिधवा, जिला - बेमेतरा
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