28 जून 2016

बरखा रानी (हेम के सार छंद)

‎बाल कविता

‎

‎बरखा रानी के रंग (हेम के सार छंद)

‎
‎करिया-करिया बादर देखत
‎हाँसत हे जिनगानी।
‎सबके मन मा आस जगत हे,
‎आवत बरखा रानी।।
‎

‎पानी देख मेचका टर्रय,
‎सुख के देय निशानी।

‎रुनझुन-रुनझुन पानी आथे,
‎बढ़िया होय किसानी।।
‎
‎गावत सुघ्घर गीत ददरिया,
‎बैठ किसान दुआरी।
‎सावन-भादो महिना आगय,
‎छाय घपट अँधियारी।।
‎
‎चंदा सूरज लुका छुपी ला,
‎खेलँय पारी-पारी।
‎छावय जग मा घुमड़-घुमड़ के,
‎बदरी कारी-कारी।।
‎
‎उछलत कूदत नाचत-नाचत,
‎करँय तमासा मछरी।
‎झूमर-झूमर डोरी नाचत,
‎पिटय केकड़ा डफरी।।
‎
‎झींगुर सोर मचावत हावय,
‎घोंघी खेलँय घाँदी।
‎चारो कोती स्वागत करथे,
‎झूम-झूम के काँदी।।
‎
‎टपटप-टपटप पानी गिरथे,
‎चुहथे खपरा छानी।
‎तरिया-नदिया होय भरावर,
‎सुघ्घर हे जिनगानी।।
‎
‎पहिरे धरती हरियर लुगरा,
‎लाय नवा खुशहाली।
‎चिरई-चुरगुन चहकत नाचय,
‎देखत बड़ हरियाली।।
‎
‎लहलहात हे खेत-खार मन,
‎किरपा बरखा रानी।
‎हेम कहँय संवारव धरती,
‎ऐही धन के दानी।।
‎
‎✍️ रचनाकार : हेमलाल साहू
‎गाँव : गिधवा, जिला : बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
‎
‎शब्दार्थ :
‎डोरी= "साँप, घाँदी=घूमना, काँदी= घास,मेचका = मेंढक
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