बाल कविता
बरखा रानी के रंग (हेम के सार छंद)
करिया-करिया बादर देखत
हाँसत हे जिनगानी।
सबके मन मा आस जगत हे,
आवत बरखा रानी।।
पानी देख मेचका टर्रय,
सुख के देय निशानी।
रुनझुन-रुनझुन पानी आथे,
बढ़िया होय किसानी।।
गावत सुघ्घर गीत ददरिया,
बैठ किसान दुआरी।
सावन-भादो महिना आगय,
छाय घपट अँधियारी।।
चंदा सूरज लुका छुपी ला,
खेलँय पारी-पारी।
छावय जग मा घुमड़-घुमड़ के,
बदरी कारी-कारी।।
उछलत कूदत नाचत-नाचत,
करँय तमासा मछरी।
झूमर-झूमर डोरी नाचत,
पिटय केकड़ा डफरी।।
झींगुर सोर मचावत हावय,
घोंघी खेलँय घाँदी।
चारो कोती स्वागत करथे,
झूम-झूम के काँदी।।
टपटप-टपटप पानी गिरथे,
चुहथे खपरा छानी।
तरिया-नदिया होय भरावर,
सुघ्घर हे जिनगानी।।
पहिरे धरती हरियर लुगरा,
लाय नवा खुशहाली।
चिरई-चुरगुन चहकत नाचय,
देखत बड़ हरियाली।।
लहलहात हे खेत-खार मन,
किरपा बरखा रानी।
हेम कहँय संवारव धरती,
ऐही धन के दानी।।
✍️ रचनाकार : हेमलाल साहू
गाँव : गिधवा, जिला : बेमेतरा (छत्तीसगढ़)
शब्दार्थ :
डोरी= "साँप, घाँदी=घूमना, काँदी= घास,मेचका = मेंढक
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