रविवार, 10 सितंबर 2017

सरसी छन्द फागुन

देख महीना आगय फागुन, घर मा हे अँधियार।
दूखन भूखन रहिके आसो, मानत हवन तिहार।।

तरिया नदिया सुक्खा हावे, सुक्खा खेती खार।
बिन पानी के मचगेे हावय, भारी हाहाकार।।

आसो के होरी मा परगे, हावय देख दुकाल।
दाना पानी बर तरसत हे, जी लागे जंजाल।।

मनखे मन ला देखव संगी, बिन पानी मुरझाय।
चिरई चुरगुन मन रोवत हे, राम राम चिल्लाय।।

लाल लाल जी परसा फुलगे, आमा हा मउराय।
मनके पीरा बाढ़त हावय, फागुन हा लकठाय।।

बबा सुनाके किस्सा ला जी, ढाढस बाँधत जाय।
आही सुख के दिन हा बेटा, कहिके ओ समझाय।।

आँव मनाबो सुघ्घर होरी, नवा नवा हे साल।
सुनही हमरो विनती रामा, खेलबो रंग गुलाल।।
-हेमलाल साहू

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